धर्म

 धर्म के नाम पर, कत्लेआम होता है

हर शहर में देखो, बलात्कार होता है।

बड़ा दुःख होता है जब यह हादसा होता है। मेरी समझ में नहीं आता है कि लोग धर्म के नाम पर मरने मारने को तैयार रहते हैं। फिर हिन्दू, हिन्दू का खून और मुस्लिम, मुस्लिम का खून क्यों करते हैं ?

कोई जेहादी बने फिरता है, कोई धर्म रक्षक बने फिरता है। फिर वह कौन है, जो बलात्कार और कत्लेआम करते फिरता है। सच तो यह है कि धर्म के पथ से सभी भटके फिर रहे हैं।

हिन्दू, मुस्लिम सिक्ख ईसाई यह सभी नाम तो एक पहचान है। जिसके कारण लोग बंटे हुए हैं। अगर यही धर्म है तो फिर उसमें जातियों की क्या जरूरत है। मैं भी हिन्दू आप भी हिन्दू। मैं भी मुस्लिम आप भी मुस्लिम। 

अगर मैं हिन्दू हूं तो मेरे द्वारा या फिर मेरे सामने किसी भी हिन्दू महिला या बच्ची के साथ दुष्कर्म नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो मुझे धिक्कार है। और अगर मैं मुस्लिम हूं तो भी मेरे द्वारा या फिर मेरे सामने किसी भी महिला या बच्ची का शोषण और दुष्कर्म नहीं होना चाहिए। मुझे धिक्कार है, ऐसी स्थिति में मैं आप या मैं ना तो हिन्दू हैं ना ही मुसलमान हैं।

धर्म का नाम जो भी हो किसी भी धर्म में मानव को मानव का दूष्मन बनने का सबक नहीं होता है। इन्सानियत, भाई चारा प्रेम, विश्वास और सहयोग ही सच्चा धर्म है। अगर हर कोई इस मार्ग पर इमानदारी से चले तो शान्ति और खुशी की प्राप्ती के साथ स्वतः ही धर्म पालन हो जाएगा।

यह मेरा अनुभव और विचार है। त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

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